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रविवार, 14 अप्रैल 2013

कुछ यादगार



याद नहीं क्या क्या देखा था, सारे मंज़र भूल गये

उसकी गलियों से जब लौटे, अपना भी घर भूल गये

खूब गये परदेस कि अपने दीवारो-दर भूल गये

शीशमहल ने ऐसा घेरा, मिट्टी के घर भूल गये

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रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई

जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए

जैसे सहाराओं में हौले से चले बादे-नसीम

जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए


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लायी हयात आये कज़ा ले चली चले

ना अपनी ख़ुशी आये ना अपनी ख़ुशी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ

तुम भी चले चलो यूं ही जब तक चली चले

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बदकिमार
जो चाल हम चले वो निहायत बुरी चले

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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

गुफ्तगु

आज का दिन  बड़ा ही  सुहाना  है, सोचा कुछ  शेर-औ-शायरी  ही हो जाय,सो पेश है चंद कतरे ............. 



               गुलशन में मंदपवन को तलाश तेरी है,
               बुलबुल की जुबां पर गुफ्तगु ....तेरी है।
               हर रंग में जलवा है तेरी कुदरत का ,
               जिस फूल को सूँघता हूँ खुशबु तेरी है।
     

                     इस रास्ते के नाम लिखो एक शाम और,
              या इसमें रौशनी का करो इतजाम  और।
              आंधी में सिर्फ हम ही उखड़ कर नही गिरे,
              हमसे जुड़ा  हुआ था कोई नाम ..... और।
                                                

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